कब तक झूठी बात करोगे।
कब तक हमें बहलाओगे।।
कैसे होगा विकास देश का।
जब भ्रष्टाचार मिटा ना पाओगे।
देखो हश्र सच का विक्रम।
झूठ से लड़ते जाओगे।
अंधे बहरों की नगरी में।
शीशा किसे दिखाओगे।
@ विक्रम @
Newslive88
ए मेरी कलम तुम क्यूं बयां करती हो दर्द।
उन्हें दर्द को दर्द लिखने से तकलीफ पहुंचती है।
Newslive88
@ विक्रम सिंह राजपूत @
बिकती रही शराफत सरे बाज़ार।
कुछ इस तरह हमारी नीलामी की गई।
Newslive88
@ विक्रम सिंह राजपूत @
दंगो की आग में क्या खोया क्या पाया है।
आंसु पोछकर देखा तो बस इंसान गवाया है
Newslive88
।। विक्रम सिंह राजपूत ।।
कहीं आंसु कहीं आहें कहीं बलात्कार बिकता है।
सुना है हर सुबह यहां झूठ का संसार बिकता है।
Newslive88
।। विक्रम सिंह राजपूत ।।





Vikram Singh Rajput
Vikram Singh Rajput
Vikram Singh Rajput
Vikram Singh Rajput
Vikram Singh Rajput
मन करता है कि कलम को तोड़ दूं।
हालत ऐसे मत बनाओ की लिखना ही छोड़ दूं।
।। विक्रम।।
Newslive88
सच की बुनियाद पर झूठ का व्यापार है।
सम्हल कर चलना जरा ये मेरे शहर का बाजार है।
।। विक्रम ।।
Newslive88
तुम्हारे आसुओं की स्याही से हर बात लिखूंगा।
जैसे भी है हालात उन्हें दिन रात लिखूंगा।
।।विक्रम।।
Newslive88
बच्चादानी निकल जाए तो भी शोर नहीं चलता।
ये जिला चिकित्सालय है यारो किसी का जोर नहीं चलता।
।। विक्रम ।।
Newslive88
अख़बारों में शोर है जिम्मेदार चोर है।
हादसों के शहर में उम्मीदों का दौर है।।
।। विक्रम ।।
Newslive88
बदनसीबी पर रोज आंसु बहा रहे हैं।
मैंने देखा है बच्चे स्कूल की जगह काल के गाल में समा रहे हैं।
।। विक्रम ।।
Newslive88
नशा विरोधी अभियानों को कागज में मत रुकने दो।
मौत कर रही तांडव देखो कदम अभी ना थकने दो ।
सत्ता के राजस्व ना देखो
जनता को भी कहने दो।
बहुत कह चुका अब तक विक्रम ,अभय क्रांति ना थमने दो।।
।। विक्रम ।।
Newslive88
Newslive88:
एकदिन मेरी मौत का तमाशा बनेगा।
लिखा है अब तक जो अफसाना बनेगा।
।। विक्रम ।।
Newslive88
अभय जान कर दुनिया को अब ।
जनता को मत डरने दो।।
कौन लड़ेगा हक की लड़ाई।
अभियानों को ना थमने दो।।
।। विक्रम ।।
इस क़दर खामोशियां महसूस हो रही है।
विकास चल रहा है या जनता सो रही है।
।। विक्रम ।।
Newslive88
सब यहां धनवानों के करीबी हैं।
तुम्हे अहसास नहीं है भारत में
कितनी गरीबी है।
।। विक्रम।।
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कब तक हमें बहलाओगे।।
कैसे होगा विकास देश का।
जब भ्रष्टाचार मिटा ना पाओगे।
देखो हश्र सच का विक्रम।
झूठ से लड़ते जाओगे।
अंधे बहरों की नगरी में।
शीशा किसे दिखाओगे।
@ विक्रम @
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ए मेरी कलम तुम क्यूं बयां करती हो दर्द।
उन्हें दर्द को दर्द लिखने से तकलीफ पहुंचती है।
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@ विक्रम सिंह राजपूत @
बिकती रही शराफत सरे बाज़ार।
कुछ इस तरह हमारी नीलामी की गई।
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@ विक्रम सिंह राजपूत @
दंगो की आग में क्या खोया क्या पाया है।
आंसु पोछकर देखा तो बस इंसान गवाया है
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।। विक्रम सिंह राजपूत ।।
कहीं आंसु कहीं आहें कहीं बलात्कार बिकता है।
सुना है हर सुबह यहां झूठ का संसार बिकता है।
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।। विक्रम सिंह राजपूत ।।
मन करता है कि कलम को तोड़ दूं।
हालत ऐसे मत बनाओ की लिखना ही छोड़ दूं।
।। विक्रम।।
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सच की बुनियाद पर झूठ का व्यापार है।
सम्हल कर चलना जरा ये मेरे शहर का बाजार है।
।। विक्रम ।।
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तुम्हारे आसुओं की स्याही से हर बात लिखूंगा।
जैसे भी है हालात उन्हें दिन रात लिखूंगा।
।।विक्रम।।
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बच्चादानी निकल जाए तो भी शोर नहीं चलता।
ये जिला चिकित्सालय है यारो किसी का जोर नहीं चलता।
।। विक्रम ।।
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अख़बारों में शोर है जिम्मेदार चोर है।
हादसों के शहर में उम्मीदों का दौर है।।
।। विक्रम ।।
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बदनसीबी पर रोज आंसु बहा रहे हैं।
मैंने देखा है बच्चे स्कूल की जगह काल के गाल में समा रहे हैं।
।। विक्रम ।।
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नशा विरोधी अभियानों को कागज में मत रुकने दो।
मौत कर रही तांडव देखो कदम अभी ना थकने दो ।
सत्ता के राजस्व ना देखो
जनता को भी कहने दो।
बहुत कह चुका अब तक विक्रम ,अभय क्रांति ना थमने दो।।
।। विक्रम ।।
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एकदिन मेरी मौत का तमाशा बनेगा।
लिखा है अब तक जो अफसाना बनेगा।
।। विक्रम ।।
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अभय जान कर दुनिया को अब ।
जनता को मत डरने दो।।
कौन लड़ेगा हक की लड़ाई।
अभियानों को ना थमने दो।।
।। विक्रम ।।
इस क़दर खामोशियां महसूस हो रही है।
विकास चल रहा है या जनता सो रही है।
।। विक्रम ।।
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सब यहां धनवानों के करीबी हैं।
तुम्हे अहसास नहीं है भारत में
कितनी गरीबी है।
।। विक्रम।।
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